अजय शर्मा
व्यस्तता का भ्रम और भागती उम्र
आधुनिक मनुष्य के जीवन की विडंबना यह है कि वह ‘जीने’ की तैयारी में इतना व्यस्त रहता है कि अंततः जीना ही भूल जाता है। समाज, परिवार और संगठन के प्रति हमारी जिम्मेदारियां केवल आर्थिक योगदान तक सीमित नहीं हैं; वे हमारे समय और उपस्थिति की मांग करती हैं। लेकिन 20 वर्ष की पढ़ाई से लेकर 80 वर्ष की अंतिम विदाई तक, हम “अभी समय नहीं है” के जिस चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं, वह अंततः हमें खाली हाथ छोड़ देता है।
जीवन के पड़ाव और बहानों की सूची
अक्सर हम अपनी व्यस्तता को अपनी मजबूरी बताते हैं, लेकिन सच तो यह है कि यह हमारी प्राथमिकताओं का चुनाव है:
युवावस्था (20-30 वर्ष): यहाँ करियर और भविष्य की चिंता समाज को ओझल कर देती है।
मध्य आयु (35-50 वर्ष): संतानों की परवरिश और ‘सेटल’ होने की अंधी दौड़ हमें आत्मकेन्द्रित बना देती है।
वृद्धावस्था (60+ वर्ष): जब शरीर साथ छोड़ने लगता है, तब इच्छा तो जागती है, पर सामर्थ्य समाप्त हो चुका होता है।
विरासत का मोह भी कितना क्षणभंगुर है कि मृत्यु के मात्र 17 दिनों के भीतर व्यक्ति का नाम उसकी अपनी ही बनाई संपत्ति से मिटा दिया जाता है। यह सत्य हमें चेतावनी देता है कि हम जो साथ ले जाएंगे, वह केवल वह ‘प्रेम’ और ‘पुण्य’ होगा जो हमने समाज के बीच रहकर कमाया है।
संगठन की शक्ति: झाड़ू
एक सूत्र में बंधा हुआ झाड़ू सफाई का सामर्थ्य रखता है, लेकिन वही तिनके जब बिखर जाते हैं, तो वे स्वयं बोझ और कचरा बन जाते हैं।”समाज, संगठन और परिवार से अलग होकर व्यक्ति अपनी पहचान और शक्ति दोनों खो देता है।”
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जब वह समूह से कटता है, तो उसकी उपयोगिता और मूल्य स्वतः ही कम हो जाते हैं। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेदों के कारण मनभेद पालकर अपनों से दूर हो जाना स्वयं के विनाश का मार्ग प्रशस्त करना है।
समय आज ही है
समाज को देने के लिए किसी विशेष मुहूर्त या रिटायरमेंट की प्रतीक्षा न करें। समाज की सेवा केवल बड़े दान या आंदोलनों से नहीं होती, बल्कि: एक-दूसरे के दुख-सुख में उपस्थित होकर, परस्पर प्रेम और सम्मान का भाव रखकर, अपने संगठन और परिवार की एकता को बनाए रखकर।
यदि हम आज समाज के लिए समय नहीं निकालेंगे, तो कल समाज भी हमारे लिए खड़ा नहीं होगा। जुड़ें रहें, जुड़े रखें। याद रखें, बिखराव में विनाश है और जुड़ाव में ही जीवन की सार्थकता है।

