अजय शर्मा
भारत में हर वर्ष गर्मियों के दौरान एक ऐसा दौर आता है, जब सूर्य की तपिश अपने चरम पर होती है। लोक परंपरा में इसे “नौतपा” कहा जाता है। ज्येष्ठ माह में सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते ही नौ दिनों तक पड़ने वाली भीषण गर्मी को नौतपा कहा जाता है। इस वर्ष भी आज से नौतपा शुरू हो चुका है और इसके साथ ही उत्तर भारत सहित कई राज्यों में तापमान तेजी से बढ़ने लगा है।
क्या है नौतपा?
भारतीय ज्योतिष और लोक मान्यताओं के अनुसार जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब पृथ्वी पर गर्मी का प्रभाव अधिक बढ़ जाता है। यह अवधि लगभग नौ दिनों तक रहती है, इसलिए इसे “नौतपा” कहा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह मान्यता भी है कि यदि नौतपा के दौरान तेज गर्मी पड़े, तो आने वाला मानसून अच्छा होता है और वर्षा संतुलित रहती है। हालांकि आधुनिक विज्ञान इसे सूर्य की सीधी किरणों, मौसमीय दबाव और पृथ्वी की स्थिति से जोड़कर देखता है। मई के अंतिम सप्ताह और जून की शुरुआत में उत्तर भारत में गर्म हवाएं यानी लू चलना सामान्य माना जाता है।
बढ़ती गर्मी और बदलता मौसम
इस बार नौतपा ऐसे समय में शुरू हुआ है, जब देश पहले से ही भीषण गर्मी और हीटवेव की मार झेल रहा है। कई शहरों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। पहाड़ी राज्यों में भी गर्मी का असर बढ़ने लगा है। मौसम वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि दोपहर के समय बाहर निकलने से बचें और शरीर में पानी की कमी न होने दें।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन ने गर्मी की तीव्रता को और बढ़ा दिया है। पहले जहां गर्मी का असर सीमित क्षेत्रों तक रहता था, अब उसका प्रभाव व्यापक और अधिक खतरनाक होता जा रहा है। जंगलों में आग, जल संकट और बिजली की बढ़ती मांग भी इसी का परिणाम हैं।
स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव
नौतपा के दौरान सबसे बड़ा खतरा हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन का होता है। बच्चे, बुजुर्ग और बाहर काम करने वाले लोग इसकी चपेट में जल्दी आते हैं। लगातार तेज धूप में रहने से चक्कर आना, सिरदर्द, उल्टी और बेहोशी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
डॉक्टर सलाह देते हैं कि—
दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक धूप में निकलने से बचें।
अधिक से अधिक पानी और तरल पदार्थ लें।
हल्के और सूती कपड़े पहनें।
बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें।
खाली पेट धूप में बाहर न जाएं।
परंपरा से सीखने की जरूरत
भारतीय परंपराओं में मौसम के अनुसार जीवनशैली बदलने की सलाह दी गई है। गर्मियों में बेल का शरबत, आम का पना, छाछ और सत्तू जैसे पारंपरिक पेय केवल स्वाद नहीं, बल्कि शरीर को ठंडक देने के प्राकृतिक उपाय हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक जीवनशैली के साथ इन पारंपरिक ज्ञान को भी अपनाया जाए।
नौतपा केवल गर्मी का दौर नहीं, बल्कि प्रकृति के बदलते स्वरूप का संकेत भी है। यह समय हमें पर्यावरण संरक्षण, जल बचाव और स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की सीख देता है। यदि हम प्रकृति के संकेतों को समझें और सावधानी बरतें, तो इस भीषण गर्मी से खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं।

