अजय शर्मा
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज का दिन इतिहास के पन्नों में एक बड़े मोड़ के रूप में दर्ज होने जा रहा है। “खेला होबे” के नारे के साथ पिछले एक दशक से अधिक समय तक सत्ता पर काबिज रहीं ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए शुरुआती रुझान किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। भाजपा, जो 2021 में 77 सीटों पर रुक गई थी, आज बहुमत के आंकड़े 147-148 को पार कर 190+ के करीब पहुंचती दिख रही है। यह महज एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि बंगाल के राजनीतिक मिजाज में आए एक गहरे बदलाव की गूंज है।
कैसे पलट गया बंगाल का चुनावी गणित?
शुरुआती रुझानों का विश्लेषण करें तो भाजपा की इस अप्रत्याशित बढ़त के पीछे कुछ प्रमुख कारण दिखाई देते हैं:
सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency): 15 साल के लंबे शासन के बाद भ्रष्टाचार के आरोप, खास तौर पर स्थानीय स्तर पर ‘कट-मनी’ और हाल के महीनों में संदेशखाली तथा आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं ने जनता के एक बड़े वर्ग में असंतोष पैदा किया।
वोटों का ध्रुवीकरण: सुवेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के नेतृत्व में भाजपा ने हिंदू मतों के ध्रुवीकरण और आदिवासी बहुल क्षेत्रों (जंगलमहल और उत्तर बंगाल) में अपनी पकड़ को और मजबूत किया है। महिलाओं के वोट, जो कभी ममता बनर्जी का ‘साइलेंट पावर’ थे, इस बार सुरक्षा और विकास के मुद्दे पर भाजपा की ओर खिसकते नजर आ रहे हैं।
संगठनात्मक शक्ति: भाजपा ने बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत की और केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाए रखा।
क्या होगा ‘दीदी’ का?
ममता बनर्जी, जिन्हें भारतीय राजनीति की सबसे जुझारू नेताओं में गिना जाता है, आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। हालांकि वह खुद भवानीपुर से बढ़त बनाए हुए हैं, लेकिन राज्य में उनकी पार्टी का ग्राफ गिरकर दो अंकों (90-100 सीटों के बीच) में सिमटता दिख रहा है।
विपक्ष की नई भूमिका: यदि ये रुझान अंतिम नतीजों में बदलते हैं, तो ममता बनर्जी को पहली बार एक सशक्त विपक्ष के रूप में विधानसभा में बैठना होगा। यह उनके राजनीतिक कौशल की असली परीक्षा होगी कि वह बिना सत्ता के अपनी पार्टी को कैसे एकजुट रखती हैं।
अस्तित्व की लड़ाई: टीएमसी के लिए चुनौती यह होगी कि सत्ता जाने के बाद पार्टी में होने वाली संभावित टूट को कैसे रोका जाए। बंगाल की राजनीति का इतिहास रहा है कि यहाँ सत्ता बदलने पर कार्यकर्ताओं और नेताओं का पलायन बहुत तेजी से होता है।
बंगाल की जनता ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह परिवर्तन के लिए तैयार रहती है। 2011 में जिस तरह वामपंथ का किला ढहा था, क्या 2026 टीएमसी के पतन का वर्ष बनेगा? हालांकि ये अभी शुरुआती रुझान हैं, लेकिन यदि भाजपा इस बढ़त को कायम रखती है, तो यह भारतीय राजनीति के लिए सबसे बड़ी खबरों में से एक होगी।
दीदी के लिए अब ‘खेला’ खत्म होता दिख रहा है और बंगाल एक नए अध्याय की शुरुआत की दहलीज पर खड़ा है।
चुनाव सांख्यिकी (रुझान):
कुल सीटें: 294 (293 पर मतदान)
बहुमत: 148
भाजपा (BJP): 190+
टीएमसी (TMC): 90-100
कांग्रेस+वाम दल: 0-2

