अजय शर्मा
सम्पादक, PACHWADUN MEDIA.COM
श्रावण मास की पूर्णिमा केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, परस्पर विश्वास और सामाजिक आत्मीयता का एक सजीव दस्तावेज है। रक्षाबंधन को सदियों से भाई-बहन के अगाध स्नेह और ‘सुरक्षा के वचन’ के रूप में देखा गया है। कलाई पर बंधा कच्चा सूत या रेशमी धागा केवल एक परंपरा का निर्वहन नहीं, बल्कि दो हृदयों के बीच अटूट आत्मीय सेतु का प्रतीक है। हालांकि, बदलते सामाजिक परिप्रेक्ष्य में इस पर्व के मूल दर्शन और उसके आधुनिक स्वरूप पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।

पौराणिक और ऐतिहासिक आख्यानों में रक्षाबंधन का फलक अत्यंत व्यापक रहा है। चाहे वह द्रोपदी द्वारा कृष्ण को बांधी गई साड़ी की कोर हो, रानी कर्णावती द्वारा हुमायूं को भेजा गया रक्षा-सूत्र, या फिर गुरु-शिष्य परंपरा में संकल्प का रक्षा-बंधन—इस पर्व का मूल तत्व कभी एकांगी नहीं रहा। वर्ष 1905 में जब बंगाल विभाजन की त्रासदी सामने आई, तब रवींद्रनाथ टैगोर ने रक्षाबंधन को सांप्रदायिक सौहार्द और एकजुटता के राजनीतिक व सामाजिक प्रतिरोध का माध्यम बनाया था। स्पष्ट है कि रक्षा का संकल्प कभी भी केवल एक परिवार या सीमित रिश्ते तक आबद्ध नहीं था।

समय के साथ इस पावन पर्व की व्याख्या में भी एक परिपक्व बदलाव आया है। लंबे समय तक इसे एक ऐसी व्यवस्था के रूप में देखा गया जहां ‘अबला’ मानी जाने वाली बहन अपनी सुरक्षा के लिए ‘सबल’ भाई पर निर्भर होती थी। आज का प्रगतिशील समाज इस पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण से आगे निकल चुका है। आज की नारी आत्मनिर्भर, सशक्त और अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम है। ऐसे में ‘रक्षा’ की परिभाषा अब केवल शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं रह सकती। यह रक्षा अब विचारों के सम्मान की है, सपनों को पंख देने की है और एक-दूसरे के विकास में सहभागी बनने की है। आज बहनें केवल भाई को ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे को भी राखी बांधकर परस्पर साथ निभाने का संकल्प ले रही हैं।
विज्ञापनों और बाज़ारवाद के दौर में रक्षाबंधन के दिखावे से बचकर इसके मूल मर्म को बचाए रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। महंगे उपहारों और औपचारिकताओं के बीच वह निश्छल भाव पीछे न छूट जाए, जो इस पर्व की आत्मा है। रक्षाबंधन का सच्चा उत्सव तब साकार होगा जब यह समाज हर स्त्री के लिए निर्भय और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करे, जहां हर रिश्ता बराबरी, गरिमा और असीम स्नेह के आधार पर पल्लवित हो सके।

