अजय शर्मा,
एक ओर जहां वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं स्थिरता की तलाश में हैं, वहीं भारत में घरेलू मोर्चे पर महंगाई का एक नया दौर दस्तक दे रहा है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा व्यावसायिक (कमर्शियल) गैस सिलेंडर की कीमतों में 993 रुपये की भारी वृद्धि और 5 किलो वाले छोटे सिलेंडर के दाम में 261.50 रुपये का उछाल केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं है, बल्कि यह आम आदमी की थाली और छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ने वाला फैसला है। दिल्ली में अब एक कमर्शियल सिलेंडर 3,071.50 रुपये का हो गया है, जो मात्र तीन महीनों में 1,303 रुपये की कुल वृद्धि को दर्शाता है।
चौतरफा प्रभाव: क्या-क्या होगा महंगा?
व्यावसायिक गैस की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर सूक्ष्म और लघु उद्योगों पर पड़ता है। इस वृद्धि के परिणाम निम्नलिखित क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देंगे-
खाद्य पदार्थ और बेकरी: बिस्कुट, ब्रेड और केक जैसे उत्पादों की उत्पादन लागत बढ़ेगी। कंपनियां या तो कीमतें बढ़ाएंगी या ‘पैकेट का वजन’ कम (shrinkflation) करके ग्राहकों को झटका देंगी।
बाहर का खाना: रेस्तरां, ढाबों और यहां तक कि रेहड़ी-पटरी वालों के लिए लागत बढ़ गई है। जिससे खाना महंगा हो जाएगा ।
ऑनलाइन डिलीवरी: स्विगी और ज़ोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भोजन मंगवाना अब और महंगा हो जाएगा, क्योंकि रेस्टोरेंट अपनी बढ़ी हुई लागत का बोझ अंततः ग्राहकों पर ही डालेंगे।
आयोजन और उत्सव: शादी-ब्याह और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों का बजट बिगड़ना तय है, जिससे मध्यम वर्ग के लिए पूर्व-निर्धारित आयोजनों को संभालना चुनौतीपूर्ण होगा।
कच्चा तेल और ईंधन का गहराता संकट
एक चिंताजनक पहलू पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संभावित वृद्धि है। पश्चिम एशिया में तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को 120 डॉलर के करीब पहुंचा दिया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के संकेत बताते हैं कि तेल कंपनियों को पेट्रोल पर 20 रुपये और डीजल पर 100 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। यदि यह बोझ जनता पर डाला गया, तो परिवहन लागत बढ़ने से हर छोटी-बड़ी वस्तु की कीमत आसमान छूने लगेगी।
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर जोखिम
महंगाई का एक दुखद पहलू यह है कि लागत बचाने के लिए छोटे होटल और ढाबे अब पुन: लकड़ी या कोयले जैसे पारंपरिक और प्रदूषक ईंधनों की ओर रुख कर सकते हैं। यह न केवल उज्ज्वला योजना और स्वच्छ ईंधन के लक्ष्यों के विपरीत है, बल्कि इससे शहरों में वायु प्रदूषण की समस्या और भी गंभीर हो जाएगी।
विमानन क्षेत्र की बदहाली
ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर जमीन से लेकर आसमान तक है। एयर इंडिया द्वारा अपनी उड़ानों में कटौती करना और अंतरराष्ट्रीय टिकटों के दामों में 150% तक की वृद्धि यह दर्शाती है कि विमानन क्षेत्र भी गहरे संकट में है। यह न केवल पर्यटन को प्रभावित करेगा बल्कि वैश्विक व्यापारिक आवाजाही को भी सुस्त कर देगा।
व्यावसायिक गैस की कीमतों में यह बेतहाशा वृद्धि “महंगाई के दुष्चक्र” को जन्म दे रही है। जब बुनियादी लागत बढ़ती है, तो इसका असर समाज के सबसे निचले तबके तक जाता है। सरकार को चाहिए कि वह केवल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का हवाला देने के बजाय, टैक्स कटौती या सब्सिडी के माध्यम से आम जनता और छोटे उद्यमियों को राहत देने के रास्ते तलाशे। यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो ‘आम आदमी’ की थाली से दाल और रोटी का स्वाद महंगाई की भेंट चढ़ जाएगा।

