अजय शर्मा
जैसे-जैसे 2027 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट तेज हो रही है, प्रदेश की सबसे हॉट सीटों में से एक—सहसपुर विधानसभा—पर राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह सीट हमेशा से एक मजबूत गढ़ रही है, जिसका श्रेय तीन बार के ‘अजेय’ विधायक सहदेव सिंह पुंडीर को जाता है। लेकिन इस बार की सियासी बयार कुछ बदली-बदली सी है। सहदेव सिंह पुंडीर के इस अभेद्य दुर्ग में इस बार बाहरी विरोधियों से ज्यादा, पार्टी के भीतर से ही मिल रही चुनौतियां उनकी मुश्किलें बढ़ाती नजर आ रही हैं। भाजपा के भीतर ही टिकट के दावेदारों की लंबी फेहरिस्त ने इस चुनावी मुकाबले को बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय से भी आगे बढ़ा दिया है।
दावेदारों का गणित: एक अनार, सौ बीमार
सहसपुर के राजनीतिक गलियारों में इस समय केवल एक ही चर्चा है—”क्या इस बार चेहरा बदलेगा?” इस चर्चा को हवा दे रहे हैं भाजपा के वो दिग्गज चेहरे जो सालों से जमीन पर पसीना बहा रहे हैं और अब खुद को नेतृत्व के लिए तैयार मान चुके हैं।
सहदेव सिंह पुंडीर (वर्तमान विधायक): तीन बार लगातार चुनाव जीतकर खुद को ‘अजेय’ साबित करने वाले पुंडीर की क्षेत्र में पकड़ जगजाहिर है। सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) के बावजूद उनका कैडर और सांगठनिक अनुभव उनकी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन लगातार तीन बार विधायक रहने के कारण जनता और कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में बदलाव की दबी-छिपी चाहत ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनती दिख रही है।
नवीन ठाकुर (पार्टी प्रवक्ता): भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रखर प्रवक्ता नवीन ठाकुर इस बार रेस में बहुत मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं। जमीन से जुड़े इस नेता की सबसे बड़ी ताकत पछवादून के युवाओं में उनकी जबरदस्त पैठ है। वर्षों से सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहने के कारण युवाओं का एक बड़ा तबका उन्हें सहसपुर के नए विकल्प के रूप में देख रहा है।
विजयपाल सिंह बर्थवाल (पूर्व प्रधान, सेंट्रल होप टाउन सेलाकुई): सहसपुर का औद्योगिक और सबसे व्यस्त हब कहे जाने वाले सेलाकुई क्षेत्र में विजयपाल सिंह बर्थवाल का अपना एक मजबूत वजूद है। पूर्व प्रधान के रूप में ग्रामीण और शहरी दोनों ही मतदाताओं के बीच उनकी सीधी पहुंच है, जो टिकट वितरण में एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
नीरज कुमार कश्यप (वरिष्ठ नेता व पूर्व दर्जाधारी मंत्री): नीरज कश्यप का राजनीतिक ग्राफ काफी दिलचस्प है। कांग्रेस के कार्यकाल में दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री रह चुके कश्यप अब भाजपा में शामिल होकर केंद्रीय मंत्री के मुख्य सलाहकार के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। युवाओं के बीच बेहद सक्रिय और लोकप्रिय नीरज लगातार क्षेत्र में बने हुए हैं और जातिगत समीकरणों के साथ-साथ युवाओं के दम पर टिकट की मजबूत दावेदारी ठोक रहे हैं।
अंदरूनी खींचतान या लोकतंत्र की खूबसूरती?
भाजपा के भीतर टिकट के लिए मचे इस घमासान को दो नजरियों से देखा जा सकता है। पहला यह कि यह भाजपा की अंदरूनी कलह और वर्तमान विधायक के प्रति असंतोष को दर्शाता है। दूसरा यह कि यह सीट भाजपा के लिए इतनी सुरक्षित मानी जा रही है कि हर बड़ा नेता यहां से अपनी जीत पक्की मानकर टिकट की होड़ में शामिल हो गया है।
बड़ा सवाल: क्या पार्टी नेतृत्व तीन बार के मौजूदा विधायक पर ही दोबारा भरोसा जताकर ‘नो रिस्क’ पॉलिसी पर चलेगा, या फिर एंटी-इन्कंबेंसी को मात देने के लिए नवीन ठाकुर या नीरज कश्यप जैसे युवा और ऊर्जावान चेहरों पर दांव लगाएगा?
शीर्ष नेतृत्व के लिए अग्निपरीक्षा
सहसपुर विधानसभा में इस बार का मुकाबला सिर्फ विपक्ष से नहीं, बल्कि अपनों की महत्वाकांक्षाओं से पार पाने का भी है। यदि टिकट वितरण में थोड़ी सी भी चूक हुई, तो भीतरघात का खतरा भाजपा की राह मुश्किल कर सकता है। वहीं, अगर पार्टी असंतोष को थामने में कामयाब रही, तो यह दुर्ग बचाना आसान होगा।
अब देखना यह होगा कि दिल्ली और देहरादून के बंद कमरों में बैठने वाला भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सहसपुर की जनता की नब्ज और कार्यकर्ताओं की ललक को भांपते हुए टिकट की पर्ची किसके नाम की फाड़ता है? क्या सहदेव सिंह पुंडीर अपनी ‘अजेय’ पारी को चौथी बार भी जारी रख पाएंगे, या फिर सहसपुर को 2027 में कोई नया नायक मिलेगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल सहसपुर की बिसात पर मोहरे सज चुके हैं और शह-मात का खेल शुरू हो चुका है।

