अजय शर्मा,
PACHWADUN MEDIA.COM
उत्तराखंड के परिवेश में इंसान और वन्यजीवों के बीच बढ़ता यह संघर्ष अब केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी बन चुका है। उत्तराखंड की भौगोलिक संरचना और यहाँ की संस्कृति का आधार ही ‘जंगल’ रहे हैं। हमारे लोकगीतों से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक, पहाड़ का जीवन वनों के इर्द-गिर्द सिमटा है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जो जंगल कभी पहाड़ियों के रक्षक और पोषणकर्ता थे, आज वही दहशत का पर्याय बनते जा रहे हैं। सहसपुर के पछवादून क्षेत्र में बीते मंगलवार को हुई हृदयविदारक घटना—जहाँ लकड़ी लेने गए 55 वर्षीय इरफान को गुलदार ने अपना निवाला बना लिया—इस कड़वे सच को फिर से उजागर करती है कि शासन-प्रशासन वन्यजीव संघर्ष को रोकने में अब तक बौना साबित हुआ है।
मुआवजे की राजनीति और जख्मों पर मरहम
अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद स्थानीय विधायक या प्रशासनिक अधिकारी मृतक के परिजनों को ‘उचित मुआवजे’ का आश्वासन देते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी व्यक्ति के जीवन का मूल्य चंद लाख रुपयों की राशि से आँका जा सकता है? सरकार जिसे ‘उचित मुआवजा’ कहती है, वह असल में एक तात्कालिक आर्थिक सहायता मात्र है। वह उस परिवार के भविष्य की सुरक्षा नहीं है जिसने अपना कमाऊ सदस्य खो दिया है। क्या मुआवजे की यह छोटी सी धनराशि उस डर को खत्म कर सकती है जो सहसपुर और पछवादून के हर घर में बैठ गया है? क्या इससे उन बच्चों की आंखों के आंसू सूख सकते हैं जिन्होंने अपने पिता को खोया है?
क्यों बढ़ रहे हैं हमले?
गुलदार के हमलों में आई इस तेजी के पीछे कई प्रमुख कारण हैं जिन पर विभाग मौन साधे रहता है ‘
प्राकृतिक आवास का विनाश: अंधाधुंध शहरीकरण और विकास के नाम पर कटते जंगलों ने गुलदार को बस्तियों की ओर रुख करने पर मजबूर किया है।
भोजन की कमी: जंगलों में शाकाहारी वन्यजीवों की घटती संख्या के कारण गुलदार अब पालतू पशुओं और इंसानों को आसान शिकार मानने लगा है।
प्रबंधन का अभाव: वन विभाग की गश्त केवल कागजों तक सीमित है। पछवादून जैसे क्षेत्रों में जहाँ आबादी और जंगल की सीमाएं आपस में मिलती हैं, वहां सोलर फेंसिंग या सुरक्षा घेरे का अभाव स्पष्ट दिखता है।
शासन-प्रशासन से कड़े सवाल
सहसपुर विधायक सहदेव सिंह पुण्डीर ने सांत्वना दी और मुआवजे की बात कही, जो कि एक शिष्टाचार है। लेकिन जनता अब सांत्वना नहीं, सुरक्षा चाहती है। जनता शासन- प्रशासन से सवाल करती है कि
गश्त में ढिलाई क्यों? जब क्षेत्र में गुलदार की चहलकदमी पहले से ही तेज थी, तो वन विभाग ने सतर्कता क्यों नहीं बढ़ाई?
खूंखार गुलदार को चिह्नित करने में देरी क्यो ? क्या विभाग एक और हमले का इंतजार कर रहा है, या उस गुलदार को ‘नरभक्षी’ घोषित कर पकड़ने की प्रक्रिया तत्काल शुरू होगी?
केवल पिंजरा लगाकर खानापूर्ति करना समाधान नहीं है। सरकार को वनों के भीतर ही वन्यजीवों के लिए भोजन और पानी का प्रबंध करना होगा।
उत्तराखंड के लोगों के दिमाग से गुलदार का खौफ निकालने के लिए सरकार को ‘रिएक्टिव’ (घटना के बाद जागना) होने के बजाय ‘प्रोएक्टिव’ (घटना से पहले तैयारी) होना पड़ेगा। ‘उचित मुआवजा’ शब्द सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन असल ‘उचित’ कदम वह होगा जिससे किसी और परिवार को यह मुआवजा लेने की नौबत न आए।
पछवादून की यह घटना एक चेतावनी है। यदि समय रहते प्रभावी ठोस नीति नहीं बनाई गई, तो पहाड़ों से पलायन का एक बड़ा कारण ‘खौफ’ भी बन जाएगा। शासन-प्रशासन को अब फाइलों से बाहर निकलकर जंगल के किनारों पर बसे उन लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, जिनका जीवन इन जंगलों पर ही निर्भर है।

