अजय शर्मा
उत्तराखंड की सियासत में ‘मुख्यमंत्री बदलने’ की पुरानी परंपरा को तोड़कर इतिहास रचने वाले पुष्कर सिंह धामी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि आगामी चुनाव धामी के चेहरे पर ही लड़े जाएंगे, राज्य की राजनीतिक तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। यह घोषणा न केवल धामी के नेतृत्व पर मुहर लगाती है, बल्कि विपक्ष के लिए भी एक बड़ी चुनौती पेश करती है।
नेतृत्व पर भरोसा: स्थिरता का संदेश
भारतीय जनता पार्ट्री के अध्यक्ष नितिन नवीन का बयान उस समय आया है जब राज्य में चुनावी सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। भाजपा ने “धामी ही चेहरा होंगे” कहकर भीतरघात की संभावनाओं को समाप्त कर दिया है और कार्यकर्ताओं को एक स्पष्ट दिशा दे दी है। यह रणनीति दर्शाती है कि हाईकमान धामी के अब तक के कार्यकाल और उनकी जन-स्वीकार्यता से संतुष्ट है।
धामी सरकार के ‘गेम चेंजर’ फैसले
पुष्कर सिंह धामी के इस कार्यकाल को उनके साहसिक और कड़े निर्णयों के लिए जाना जाएगा। उनके कुछ ऐसे कदम हैं जिन्होंने न केवल उत्तराखंड, बल्कि देश की राजनीति में भी हलचल पैदा की:
समान नागरिक संहिता (UCC): उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बना जिसने UCC विधेयक पारित किया। यह धामी सरकार का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।
सख्त नकल विरोधी कानून: सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता लाने के लिए देश का सबसे कठोर नकल विरोधी कानून लागू करना युवाओं के बीच उनकी छवि सुधारने में सहायक रहा।
धर्मांतरण और अतिक्रमण पर प्रहार: ‘लैंड जिहाद’ के खिलाफ अभियान और सख्त धर्मांतरण विरोधी कानून ने हिंदुत्व के एजेंडे को मजबूती दी, जो भाजपा के मुख्य वोट बैंक को आकर्षित करता है।
महिला आरक्षण: सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 30% क्षैतिज आरक्षण देकर धामी ने राज्य की ‘मातृशक्ति’ का भरोसा जीता है, जो उत्तराखंड के चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
चुनौतियां और समीकरण
भले ही पलड़ा भारी दिख रहा हो, लेकिन राजनीति में राह कभी निष्कंटक नहीं होती। धामी के सामने कुछ प्रमुख चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं:
स्थानीय मुद्दे: पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और जंगली जानवरों का आतंक ऐसे मुद्दे हैं जिन पर जनता की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है।
एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर): लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी करना किसी भी दल के लिए चुनौतीपूर्ण होता है।
विपक्ष की घेराबंदी: बेरोजगारी और महंगाई को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। पुष्कर सिंह धामी ने अपने कार्यकाल में ‘युवा और धाकड़’ नेता की छवि गढ़ी है। उनके निर्णय यह दर्शाते हैं कि वे केवल सत्ता चलाने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए आए हैं। यदि भाजपा अपने विकास कार्यों और ‘धामी के चेहरे’ को सही ढंग से जनता तक पहुँचाने में सफल रहती है, तो “धामी ही फिर उत्तराखंड के स्वामी होंगे” वाली बात हकीकत में बदल सकती है। फिलहाल, भाजपा ने अपनी बिसात बिछा दी है और गेंद अब जनता के पाले में है।

