अजय शर्मा
Editor, PACHWADUN MEDIA.COM
यह एक अत्यंत संवेदनशील और विवादास्पद विषय है, जो वर्तमान समाज में कानूनी अधिकारों, नैतिक मूल्यों और सामाजिक बदलावों के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। वावजूद इसके इस पर चर्चा करना महत्वपूर्ण है ।
आज का समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ सदियों पुरानी रूढ़ियाँ टूट रही हैं और नए अधिकार जन्म ले रहे हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान इसलिए शुरू किए गए क्योंकि कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराधों ने हमारे लिंग अनुपात को खतरे में डाल दिया था। लेकिन, जैसे-जैसे महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिली है, समाज के एक वर्ग में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश और चिंता भी है कि क्या इन कानूनों का इस्तेमाल ‘समानता’ के बजाय ‘प्रतिशोध’ या ‘स्वतंत्रता के दुरुपयोग’ के लिए किया जा रहा है?
1. कानूनी सुरक्षा बनाम दुरुपयोग की बहस
भारतीय कानून में गुजारा भत्ता (Alimony) और घरेलू हिंसा से जुड़े प्रावधान महिलाओं को उस स्थिति में सुरक्षा देने के लिए बनाए गए थे जहाँ वे आर्थिक और सामाजिक रूप से असहाय थीं। हालांकि, अदालतों में ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या चिंताजनक है जहाँ इन कानूनों का इस्तेमाल केवल पति को ही नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार (माता-पिता और भाई-बहनों) को मानसिक और कानूनी दबाव में लाने के लिए किया जाता है। जब निर्दोष परिवारजन कानूनी प्रक्रिया में फंसते हैं, तो न्याय का मूल उद्देश्य ही धूमिल हो जाता है।
2. ‘पैर की जूती’ से ‘पापा की परी’ तक का सफर
बुजुर्गों की पुरानी कहावतें जैसे “पैर की जूती” एक ऐसे दौर की उपज थीं जहाँ पितृसत्तात्मक सोच हावी थी। आज के दौर में इसे स्वीकार करना कठिन है क्योंकि मानवीय गरिमा लिंग पर आधारित नहीं हो सकती। लेकिन, दूसरी तरफ “पापा की परी” जैसे आधुनिक मुहावरे उस परवरिश की ओर इशारा करते हैं जहाँ अनुशासन की कमी और अति-लाड़ प्यार कभी-कभी व्यक्ति को जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह बना देता है। जब रिश्तों में ठहराव और त्याग की जगह ‘अति-स्वतंत्रता’ ले लेती है, तो परिवार टूटने की कगार पर पहुँच जाते हैं।
3. समानता का असली अर्थ क्या है?
समानता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि एक पक्ष को असीमित अधिकार मिल जाएं और दूसरा पक्ष केवल कर्तव्यों और दंड के बोझ तले दब जाए।
न्याय का नजरिया: यदि एक पुरुष दूसरी शादी करता है, तो कानून आर्थिक दंड लगाता है। यदि एक महिला रिश्तों में अस्थिरता दिखाती है, तो समाज उसे ‘मर्जी’ का नाम देता है।
अंधा कानून?: कानून को ‘अंधा’ इसलिए कहा जाता है ताकि वह बिना किसी भेदभाव के साक्ष्यों पर काम करे। लेकिन जब साक्ष्यों से ज्यादा भावनाओं या एकतरफा बयानों को प्रधानता मिलने लगती है, तो समाज में असंतोष पैदा होता है।
4. रिश्तों की नैतिकता और सुरक्षा का प्रश्न
एक कड़वा सच यह भी है कि आज ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ और बाहरी रिश्तों के कारण कई घर तबाह हो रहे हैं। जब सुरक्षा के नाम पर मिलने वाले अधिकारों का उपयोग गलत रिश्तों को संरक्षण देने के लिए किया जाता है, तो कानून अपनी नैतिकता खो देता है। समाज का यह दोहरा चेहरा—जहाँ रक्षक ही भक्षक बन जाए या पीड़ित ही अपराधी बन जाए—चिंता का विषय है।
स्त्री और पुरुष ‘बराबर’ होने का अर्थ शारीरिक या व्यवहारिक समानता नहीं, बल्कि ‘अवसर और सम्मान’ की समानता होना चाहिए। अधिकारों का दुरुपयोग चाहे पुरुष करे या महिला, वह समाज के ताने-बाने को कमजोर ही करता है।
हमें एक ऐसे समाज की आवश्यकता है जहाँ, झूठी शिकायतों के खिलाफ भी कड़े कानून हों ताकि निर्दोष परिवारों को बचाया जा सके। रिश्तों में संस्कार और अनुशासन को केवल महिलाओं तक सीमित न रखकर दोनों पक्षों के लिए अनिवार्य माना जाए।
कानून का उपयोग सुरक्षा के लिए हो, हथियार के रूप में नहीं।
सच्चाई अक्सर कड़वी होती है, और जो इसे बोलता है उसे अक्सर ‘गलत नजरिया’ रखने वाला करार दे दिया जाता है। लेकिन एक स्वस्थ समाज वही है जो इन विसंगतियों पर खुलकर चर्चा करे और सुधार की दिशा में बढ़े।

