अजय शर्मा
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, तप और आत्मसंयम का महापर्व है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और भगवान शिव की आराधना में लीन रहते हैं। किंतु इस आध्यात्मिक साधना का वास्तविक समापन अगले दिन होने वाले भंडारे से होता है। प्रश्न उठता है कि शिवरात्रि के अगले दिन भंडारा क्यों किया जाता है? इसका उत्तर केवल परंपरा में नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति की मूल भावना में निहित है।
महाशिवरात्रि का व्रत आत्मसंयम और तपस्या का प्रतीक है। पूरी रात उपवास और पूजा के बाद अगले दिन व्रत का पारण किया जाता है। यही वह क्षण है जब व्यक्तिगत साधना सामूहिक सेवा में बदल जाती है। भंडारा उसी सेवा भावना का विस्तार है। हिंदू संस्कृति में अन्नदान को सर्वोच्च दान माना गया है। यह केवल भोजन बांटना नहीं, बल्कि समानता और सद्भाव का संदेश देना है।
भगवान शिव को ‘भोलेनाथ’ कहा जाता है—वे सरलता, करुणा और समता के प्रतीक हैं। उनकी भक्ति में दिखावा नहीं, बल्कि निष्काम सेवा का महत्व है। भंडारे के माध्यम से समाज के हर वर्ग—गरीब, अमीर, छोटे-बड़े—सभी को एक पंक्ति में बैठाकर भोजन कराया जाता है। यह दृश्य अपने आप में सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण है।
आज के समय में, जब समाज वर्ग, जाति और आर्थिक विभाजन की चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे आयोजनों का महत्व और बढ़ जाता है। भंडारा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का माध्यम है। यह हमें याद दिलाता है कि पूजा केवल मंदिर की चारदीवारी तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका विस्तार मानव सेवा तक होना चाहिए।
महाशिवरात्रि के अगले दिन भंडारा इसलिए किया जाता है क्योंकि भक्ति का सर्वोच्च रूप सेवा है। उपवास और आराधना से जो ऊर्जा और श्रद्धा अर्जित होती है, वह अन्नदान के रूप में समाज को समर्पित की जाती है। यही भारतीय संस्कृति का सार है—आत्मकल्याण से लोककल्याण की ओर यात्रा।
अतः शिवरात्रि के बाद का भंडारा केवल परंपरा नहीं, बल्कि यह संदेश है कि सच्ची पूजा वही है, जो मानवता की सेवा में परिणत हो। यही शिवत्व है, यही सनातन संस्कृति की आत्मा।

