अजय शर्मा ,
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, जिसे अपनी शांति और सुरक्षित वातावरण के लिए जाना जाता था, आज अपराधियों की शरणस्थली बनती जा रही है। शहर में अपराध का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसने पुलिसिया इकबाल और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीते कुछ महीनों में हुई जघन्य हत्याओं की कतार ने स्थानीय निवासियों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है।
सेलाकुई हत्याकांड: दो महीने बाद भी मुख्य आरोपी फरार
सबसे चौंकाने वाला मामला 9 दिसंबर 2025 का है, जब सेलाकुई में एंजल चकमा नाम की युवक की चाकुओं से गोदकर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस मामले का मुख्य आरोपी यज्ञराज अवस्थी (निवासी: कंचनपुर, नेपाल) घटना के इतने लंबे समय बाद भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। आरोपी का सीमा पार का कनेक्शन पुलिस के लिए चुनौती बना हुआ है, लेकिन पीड़िता के परिवार को आज भी न्याय का इंतजार है।
पछवादून में अपने ने ही बहाया खून
अपराध की आग पछवादून तक भी फैली हुई है। ढालीपुर गांव में एक भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को कलंकित करने वाली घटना सामने आई, जहां चचेरे भाई सुरेन्द्र ने अपनी ही बहन मनीषा की निर्मम हत्या कर दी। घटना के बाद से ही हत्यारा फरार चल रहा है और पुलिस के हाथ अब तक खाली हैं।
तीर्थ नगरी ऋषिकेश में गोलियों की गूंज
शांति और अध्यात्म का केंद्र कही जाने वाली ऋषिकेश भी इस खूनी खेल से अछूती नहीं रही। शिवाजी नगर में एम्स (AIIMS) में कार्यरत एक महिला अटेंडेंट की उसके प्रेमी ने उसी के घर मे गोली मारकर हत्या कर दी। इस मामले में भी हत्यारा वारदात को अंजाम देकर बड़ी आसानी से फरार होने में कामयाब रहा।
ताजा मामला: मच्छी बाजार में सरेआम कत्ल
राजधानी के हृदय स्थल मच्छी बाजार में आज उस वक्त हड़कंप मच गया जब एक सिरफिरे युवक ने चापड़ से प्रहार कर एक युवती की जान ले ली। हालांकि, इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को मौके के कुछ ही देर बाद धर दबोचा, लेकिन सरेबाजार हुई इस घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है।
बढ़ता अपराध: जनता में आक्रोश
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देहरादून में अब अपराधी खुलेआम वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। हत्याओं का बढ़ता ग्राफ और फरार आरोपियों की लंबी फेहरिस्त पुलिस की कार्यप्रणाली पर उंगली उठा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। पुलिस प्रशासन के लिए चुनौती बढ़ती जा रही है। क्या खाकी का खौफ खत्म हो चुका है?

