अजय शर्मा
Editor, PACHWADUN MEDIA.COM
आज सुबह शहर की एक व्यस्त सड़क के किनारे, धूल और शोर के बीच एक वृद्ध को टोकरी में ‘कमरख’ (Star Fruit) बेचते देख कदम ठिठक गए। उन पीले-हरे, कोनों वाले फलों को देखकर मन झटके से तीन दशक पीछे उस गाँव की पगडंडी पर पहुँच गया, जहाँ पूरे मोहल्ले में कमरख का सिर्फ एक ही पेड़ हुआ करता था। वह पेड़ सिर्फ फल नहीं देता था, बल्कि हमारे बचपन के रोमांच का केंद्र था। दोपहर की चिलचिलाती धूप में बड़ों की नजरें बचाकर उस पेड़ से कमरख ‘चोरी’ करने का जो स्वाद था, वह आज के महंगे मॉल से खरीदे गए विदेशी फलों में कहाँ!
आज जब हम विकास की बातें करते हैं, तो शायद हम उन छोटे-छोटे सुखों और सेहत के खजानों को पीछे छोड़ आए हैं। कमरख, जिसे हम ‘स्टार फ्रूट’ के नाम से भी जानते हैं, आज अपनी पहचान खो रहा है। यह केवल एक फल की विलुप्ति नहीं है, बल्कि उस सादगी और प्राकृतिक स्वास्थ्य की भी विदाई है जो हमारी संस्कृति का हिस्सा थी।
गुणों का पावरहाउस: स्वाद ही नहीं, सेहत भी
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो कमरख प्रकृति का दिया हुआ एक ‘मल्टी-विटामिन’ कैप्सूल है। यह विटामिन-सी, फाइबर और शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स से लबालब है।
इम्युनिटी और पाचन: यह न केवल हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है, बल्कि पाचन तंत्र के लिए भी रामबाण है।
हृदय और कोलेस्ट्रॉल: आधुनिक शोध बताते हैं कि यह हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने, सूजन (Inflammation) कम करने और खराब कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में सहायक है।
वजन प्रबंधन: कम कैलोरी होने के कारण यह उन लोगों के लिए बेहतरीन स्नैक है जो वजन घटाना चाहते हैं।
नई पीढ़ी और जानकारी का अभाव
विडंबना देखिए, आज की ‘जेन-जी’ (Gen-Z) पीढ़ी कीवी और ड्रैगन फ्रूट के नाम तो जानती है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि उनके अपने आँगन का यह ‘सितारा’ फल उनसे कहीं ज्यादा गुणकारी और सस्ता है। बाजार में इसकी कम उपलब्धता और व्यावसायिक खेती की कमी ने इसे ‘दुर्लभ’ बना दिया है। कभी-कभार ही सड़क किनारे किसी बुजुर्ग की टोकरी में यह फल नजर आता है, जो शायद हमारी तरह की पुरानी पीढ़ी की यादों को ताजा करने के लिए वहाँ मौजूद होता है।
संवाद की जरूरत: क्यों हो रहा है यह विलुप्त?
शहरीकरण की अंधी दौड़ में हमने उन पारंपरिक पेड़ों को काट दिया जो हमारी मिट्टी की पहचान थे। बाजार के दबाव ने किसानों को सिर्फ उन्हीं फसलों तक सीमित कर दिया जो ‘कैश क्रॉप’ कहलाती हैं। नतीजा यह हुआ कि कमरख जैसा अनमोल फल आज विलुप्ति की कगार पर है।
विरासत को सहेजने का वक्त
हमें केवल यादों में नहीं जीना है, बल्कि उन यादों को जमीन पर उतारना होगा। आज जरूरत है कि हम अपनी नर्सरियों में कमरख जैसे पारंपरिक पौधों को फिर से जगह दें। नई पीढ़ी को केवल इसके स्वाद से ही नहीं, बल्कि इसके औषधीय गुणों से भी परिचित कराएं।
सड़क किनारे उस वृद्ध से खरीदे गए वे चंद कमरख सिर्फ फल नहीं थे, वे एक पुकार थे—अपनी जड़ों की ओर लौटने की पुकार। कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ी के लिए ‘स्टार फ्रूट’ सिर्फ किताबों के पन्नों या मोबाइल की स्क्रीन तक ही सीमित रह जाए।

