अजय शर्मा
गर्मी का पारा चढ़ते ही उत्तराखंड के जंगलों और रिहायशी इलाकों में ‘फायर सीजन’ की आहट खौफ पैदा करने लगी है। पछवादून का औद्योगिक केंद्र सेलाकुई, जो अपनी भौगोलिक स्थिति और औद्योगिक इकाइयों के कारण बेहद संवेदनशील माना जाता है, आज खुद अपनी सुरक्षा के लिए जद्दोजहद कर रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कोतवाली सहसपुर, थाना सेलाकुई और आसपास के सैकड़ों गांवों व मजरों की सुरक्षा का जिम्मा उठाने वाला सेलाकुई फायर स्टेशन खुद संसाधनों की भारी किल्लत से जूझ रहा है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ‘भगवान भरोसे’ है।
खटारा वाहनों के दम पर सुरक्षा का दावा
फायर स्टेशन की मजबूती उसके वाहनों और आधुनिक उपकरणों से मापी जाती है। सेलाकुई फायर स्टेशन के पास कुल तीन वाहन हैं—दो बड़े और एक छोटा। विडंबना देखिए कि इनमें से एक बड़ा वाहन अपनी 15 वर्ष की निर्धारित आयु पूरी कर चुका है। कायदे से जिस वाहन को सड़क से हट जाना चाहिए था, संसाधनों की कमी के चलते विभाग आज भी उसी से आग बुझाने की उम्मीद लगाए बैठा है। क्या शासन-प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, जब ये जवाब दे चुके वाहन मौके पर पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देंगे?
चुनौतियां और भौगोलिक जटिलता
सेलाकुई और सहसपुर का पूरा क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ है। फायर सीजन में वनाग्नि की घटनाएं रोजाना की बात हो गई हैं। जंगलों की आग न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि आबादी वाले क्षेत्रों के लिए भी बड़ा खतरा बनी हुई है। ऐसे में एक छोटा वाहन और दो (जिनमें से एक एक्सपायर हो चुका है) बड़े वाहन इतने विशाल क्षेत्र की सुरक्षा के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं।
औद्योगिक क्षेत्र की अनदेखी भारी न पड़ जाए
सेलाकुई एक प्रमुख इंडस्ट्रियल हब है। यहाँ सैकड़ों फैक्ट्रियां हैं जहाँ केमिकल, फार्मा और अन्य संवेदनशील सामग्री का उपयोग होता है। यदि किसी बड़ी इकाई में आगजनी की घटना होती है, तो वर्तमान संसाधनों के साथ उस पर काबू पाना नामुमकिन होगा। प्रशासन की यह सुस्ती न केवल स्थानीय निवासियों बल्कि करोड़ों के निवेश और हजारों मजदूरों के जीवन को भी जोखिम में डाल रही है।
जवाबदेही की जरूरत
सरकार और संबंधित विभाग की चुप्पी हैरान करने वाली है। क्या पछवादून की जनता का जीवन इतना सस्ता है कि उसे कंडम हो चुके वाहनों के भरोसे छोड़ दिया जाए? केवल बैठकों और कागजी दावों से आग नहीं बुझती, उसके लिए आधुनिक उपकरणों और क्रियाशील वाहनों की आवश्यकता होती है। समय रहते यदि सेलाकुई फायर स्टेशन को नए वाहन और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए, तो आने वाले दिनों में क्षेत्र को भारी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अब गेंद शासन के पाले में है—क्या वे इस चेतावनी को गंभीरता से लेंगे या पछवादून को राख होने के लिए छोड़ देंगे?

