अजय शर्मा
देहरादून और आसपास के क्षेत्रों से पिछले दो हफ्तों में सामने आई आपराधिक घटनाएं न केवल चौंकाने वाली हैं, बल्कि यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमारी देवभूमि अब अपराध की भूमि बनती जा रही है? 29 जनवरी से 11 फरवरी के बीच हुई हत्याओं का सिलसिला यह बताने के लिए काफी है कि अपराधियों के मन में कानून और पुलिस का डर खत्म होता जा रहा है।
क्रूरता की बढ़ती सीमाएं
इन घटनाओं पर गौर करें तो अपराध की प्रकृति बेहद डरावनी है। विकासनगर में एक 18 वर्षीय युवती की हत्या हो या ऋषिकेश में प्रेमी द्वारा महिला को गोली मारना—ये घटनाएं दर्शाती हैं कि व्यक्तिगत संबंधों में धैर्य और संवाद की जगह हिंसा ने ले ली है। सबसे अधिक हृदयविदारक घटना दून के मछली बाजार में घटी, जहां सरेराह 23 वर्षीय गुंजन का गला रेत दिया गया। बीच बाजार में ऐसी नृशंसता इस बात का प्रमाण है कि अपराधी अब समाज और पुलिस को चुनौती देने से भी नहीं कतरा रहे हैं।
चिंता का विषय: सरेराह हत्याएं
11 फरवरी को तिब्बती मार्केट में एक शहीद कर्नल के बेटे, अर्जुन शर्मा की गोली मारकर हत्या कर देना सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है। सार्वजनिक स्थानों पर हथियार लहराना और गोलीबारी करना यह संकेत देता है कि अवैध हथियारों की पहुंच बढ़ रही है और ‘इंटेलिजेंस’ या ‘गश्त’ के दावे केवल कागजों तक सीमित हैं।
जवाबदेही किसकी?
जब शहर के व्यस्ततम बाजारों (जैसे मछली बाजार या तिब्बती मार्केट) में हत्याएं होने लगें, तो आम नागरिक खुद को कहां सुरक्षित महसूस करेगा? पुलिस प्रशासन को केवल घटना के बाद गिरफ्तारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ‘निवारक पुलिसिंग’ (Preventive Policing) पर ध्यान देना होगा।
क्या बाजारों में सीसीटीवी कैमरे सक्रिय थे?
क्या संदिग्धों की आवाजाही पर कोई नजर रखी जा रही है?
अवैध हथियारों और धारदार चापड़ जैसे औजारों तक पहुंच इतनी आसान क्यों है?
यह समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि कड़े कदम उठाने का है। समाज के रूप में हमें बढ़ते हिंसक व्यवहार के मनोविश्लेषण की जरूरत है, तो वहीं पुलिस प्रशासन को अपनी धमक दोबारा कायम करनी होगी। यदि समय रहते इन बढ़ते कदमों को नहीं रोका गया, तो दून की शांति और सुरक्षा केवल बीते कल की बात बनकर रह जाएगी।

