अजय शर्मा
कभी अपनी शांत वादियों, ‘रिटायर्ड लाइफ’ के लिए सुकून और शिक्षा के केंद्र के रूप में पहचाने जाने वाला देहरादून आज एक अलग ही वजह से सुर्खियों में है। पिछले कुछ हफ्तों के आंकड़ों पर नजर डालें तो ऐसा लगता है जैसे दून घाटी को किसी की बुरी नजर लग गई है। एक के बाद एक होती हत्याएं और दिन-दहाड़े गोलीबारी की घटनाओं ने आम नागरिक के मन में असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है। देहरादून, जिसे हम अपनी शांति और सौम्य वातावरण के लिए ‘देवभूमि’ के प्रवेश द्वार के रूप में जानते हैं, आज अपराध की खबरों से दहला हुआ है। हालिया घटनाओं की श्रृंखला ने न केवल पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, बल्कि समाज के भीतर गहराते तनाव को भी उजागर किया है।
अपराध का खौफनाक कैलेंडर
सोशल मीडिया और समाचारों में तैरती वह सूची किसी का भी दिल दहलाने के लिए काफी है ।
29 जनवरी: विकासनगर में एक 18 वर्षीय छात्रा की उसके ही चचेरे भाई द्वारा हत्या।
31 जनवरी: ऋषिकेश में एम्स की महिला कर्मचारी पर घर में घुसकर हमला।
2 फरवरी: पलटन बाजार जैसे व्यस्त इलाके में 23 वर्षीय युवती की गला काटकर हत्या।
11-13 फरवरी: तिब्बती मार्केट और सिल्वर सिटी मॉल के पास सरेराह गोलियां चलना।
ताजा घटना: आज वसंत विहार में एक और युवक की हत्या ने इस डर को चरम पर पहुंचा दिया है।
बदलते दून का कड़वा सच
क्या यह सिर्फ कानून-व्यवस्था की विफलता है, या हमारे सामाजिक ताने-बाने में कोई गहरी दरार आ गई है?
नशे का बढ़ता जाल: घाटी में पैर पसारता ड्रग्स और स्मैक का कारोबार युवाओं को हिंसक बना रहा है। छोटी-छोटी बातों पर आपा खोना और हथियार उठा लेना इसी मानसिक विकृति का परिणाम है।
अनियंत्रित बाहरी दबाव: दून अब छोटा शहर नहीं रहा। तेजी से होते शहरीकरण और बाहरी राज्यों के अपराधियों की शरणस्थली बनने के कारण यहाँ की शांति भंग हो रही है।
पुलिस का इकबाल: जब अपराधी भीड़भाड़ वाले बाजारों और मॉल के बाहर बेखौफ होकर गोली चलाते हैं, तो यह सीधे तौर पर खाकी के डर के खत्म होने का संकेत है।
अब और नहीं…
देवभूमि की इस पावन घाटी को ‘क्राइम कैपिटल’ बनने से बचाना होगा। प्रशासन को केवल ‘जांच जारी है’ के रटारटाए जुमलों से आगे बढ़कर सख्त कदम उठाने होंगे। बीट पुलिसिंग को मजबूत करना, संदिग्धों का सत्यापन और नशा माफियाओं की कमर तोड़ना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।
“दून की आबोहवा में अब बारूद की गंध नहीं, बल्कि वही पुरानी लीची के बागों की खुशबू और बासमती चावल की महक, शांति लौटनी चाहिए। इसके लिए समाज और सरकार दोनों को जागना होगा।”

